बलवंत भैया: ग्वालियर के वो गुमनाम वास्तुकार जिनका सिंधिया राजघराने से था गहरा नाता
ग्वालियर शहर, जिसे अपनी ऐतिहासिक इमारतों और भव्य किलों के लिए जाना जाता है, उसके वास्तुशिल्प को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनका नाम आज भी शहर के इतिहास के पन्नों में दर्ज है – भैयासाहेब बलवंत राव शिंदे, जिन्हें प्यार से लोग ‘बलवंत भैया’ कहकर पुकारते थे।
बलवंत भैया केवल एक नाम नहीं, बल्कि विद्वता, कलाप्रेम और वास्तुकला का संगम थे। उनका संबंध सिंधिया राजघराने से था। हालांकि, वह सीधे तौर पर शाही परिवार के सदस्य नहीं थे, लेकिन उनका रुतबा किसी राजकुमार से कम नहीं था। उन्हें राजसी सुविधाएं प्राप्त थीं और उनका सिंधिया परिवार के साथ एक निकट और भरोसेमंद संबंध था। वे एक शिक्षित, आध्यात्मिक और कला प्रेमी व्यक्ति थे, जिन्होंने अपना अधिकांश जीवन ग्वालियर में ही व्यतीत किया।
ग्वालियर की भव्य इमारतों का शिल्पकार
बलवंत भैया एक कुशल वास्तुकार (Architect) थे, जिन्होंने ग्वालियर की कई प्रमुख और ऐतिहासिक इमारतों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- वास्तुकला में योगदान: उनके द्वारा डिज़ाइन की गई इमारतों में उनकी दूरदर्शिता और कलात्मकता साफ झलकती है। उन्होंने तत्कालीन आधुनिकता और पारंपरिक भारतीय वास्तुकला का ऐसा समन्वय किया कि उनकी रचनाएं समय से आगे की लगती थीं।
- रोशनी और हवा का बेहतरीन प्रबंधन: उनकी इमारतों की डिज़ाइनिंग इस तरह से की जाती थी कि उनमें रोशनी और हवा (Light and Ventilation) का आवागमन उत्कृष्ट होता था, जो उन्हें उस समय के हिसाब से बेहद आधुनिक बनाता था।
- प्रसिद्ध इमारतें: उन्होंने ग्वालियर में कई महत्वपूर्ण भवनों के निर्माण में योगदान दिया, जिनमें से सबसे प्रमुख ग्वालियर का विक्टोरिया महल अब विक्टोरिया मार्केट वा टाउन हॉल है। हालांकि, उनकी सबसे प्रसिद्ध पहचान उनकी अपनी ‘बलवंत राव की कोठी’ से जुड़ी हुई है।


बलवंत राव की कोठी’ और आखिरी दिन

यह कोठी, जिसे हरिशंकर पुरम इलाके में ‘बलवंत भैया की कोठी’ के नाम से जाना जाता है, उनके जीवन के अंतिम दिनों की साक्षी बनी। उन्होंने अपने जीवन का यह अंतिम समय इसी एकांत कोठी में व्यतीत किया।
- आज का रहस्य: आज यह कोठी खंडहर (Ruins) बन चुकी है और यह एक रहस्यमय आभा से घिरी हुई है। स्थानीय लोगों के बीच इस कोठी को लेकर कई अजीबोगरीब और ‘भूतिया’ किस्से प्रचलित हैं। कहा जाता है कि लोग आज भी दिन के समय भी यहाँ जाने से डरते हैं, हालाँकि इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। यह रहस्य ही इस कोठी और बलवंत भैया को आज भी ग्वालियर के जनमानस में जीवंत रखता है।
