गिरवाई थाने में स्थाई वारंटी नरेश यादव और आरक्षक संग्राम रावत की जुगलबंदी ने खड़े किए गंभीर सवाल, वरिष्ठ अधिकारियों की चुप्पी पर संदेह।
ग्वालियर:
मध्य प्रदेश पुलिस के ‘देश भक्ति-जन सेवा’ के नारे पर ग्वालियर के गिरवाई थाना क्षेत्र से आई एक तस्वीर ने कालिख पोत दी है। जहाँ एक तरफ पुलिस अपराधियों की धरपकड़ का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ थाने के भीतर ही अपराधी न केवल बेखौफ घूम रहे हैं, बल्कि वर्दीधारियों के साथ मुस्कुराते हुए तस्वीरें खिंचवा रहे हैं।
ताजा मामला गिरवाई थाने का है, जहाँ बहोड़ापुर थाने का स्थाई वारंटी (Standing Warrantee) और कुख्यात रेत माफिया नरेश यादव पुलिस की मेहमाननवाजी का आनंद लेते देखा गया।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, रेत माफिया नरेश यादव, जिसके खिलाफ कई गंभीर अपराध दर्ज हैं और जो पुलिस रिकॉर्ड में वांछित है, वह गिरवाई थाने में खुलेआम देखा गया। हद तो तब हो गई जब आरोपी ने थाने में पदस्थ आरक्षक संग्राम रावत के साथ बड़ी आत्मीयता से फोटो खिंचवाई। यह तस्वीर अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जो पुलिस और अपराधियों के बीच की सांठगांठ (Nexus) को उजागर करने के लिए काफी है।
वर्दी की आड़ में संरक्षण?
सूत्रों का कहना है कि नरेश यादव का थाने में आना-जाना आम बात है। जिस अपराधी को हवालात के पीछे होना चाहिए था, वह आरक्षक के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है। यह घटना दर्शाती है कि स्थानीय स्तर पर पुलिसकर्मियों का अपराधियों के प्रति रवैया कितना नरम है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि:
रेत माफिया के खिलाफ कार्रवाई केवल फाइलों तक सीमित है।
जमीनी हकीकत में पुलिस और माफिया का गठजोड़ इतना मजबूत है कि वारंटी भी थाने को अपना सुरक्षित ठिकाना मानते हैं।
जब रक्षक ही भक्षक के साथ खड़े नजर आएं, तो आम जनता की सुरक्षा राम भरोसे है।
जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका संदेह के घेरे में
यह प्रकरण केवल एक आरक्षक तक सीमित नहीं माना जा सकता। एक वांछित अपराधी थाने में आता है, फोटो खिंचवाता है और चला जाता है—यह थाना प्रभारी और वरिष्ठ अधिकारियों की जानकारी के बिना संभव नहीं लगता।
बड़ा सवाल यह है कि क्या वरिष्ठ अधिकारी जानबूझकर इन गतिविधियों से अनजान बने हुए हैं? या फिर ‘सिस्टम’ के भ्रष्टाचार ने उनकी आँखों पर पट्टी बांध दी है?
