ग्वालियर। कहते हैं पुलिस की नौकरी 24 घंटे की होती है और फोन पुलिसवाले का सबसे बड़ा हथियार। लेकिन ग्वालियर शहर के एक ‘महत्वपूर्ण और बड़े थाने’ की कमान जब से एक तेजतर्रार मानी जाने वाली मैडम’ के हाथ में आई है, तब से उनका मोबाइल फोन शायद शोपीस (Showpiece) बनकर रह गया है।
आलम ये है कि थाने का सीयूजी (CUG) नंबर हो या मैडम का पर्सनल नंबर, घंटी बजती रहती है, लेकिन फोन उठता नहीं है।
वरिष्ठों का फोन भी ‘वेटिंग’ में?
महकमे में दबी जुबान में चर्चा है कि मैडम की व्यस्तता इतनी ज्यादा है कि उनके आगे प्रोटोकॉल भी पानी भरता नजर आता है। सुना है कि कंट्रोल रूम का वायरलेस सेट भले ही चिल्लाता रहे, या फिर खुद ‘जिले के आला अधिकारियों का फोन ही क्यों न आ जाए, मजाल है जो मैडम का अंगूठा ‘रिसीव’ बटन तक पहुँच जाए।
आम जनता तो छोड़िये, जब विभाग के ही बड़े साहब लोग फोन मिलाकर थक जाते हैं और उधर से कोई जवाब नहीं मिलता, तो वे भी सोच में पड़ जाते हैं कि मैडम किसी ‘क्राइम मीटिंग’ में व्यस्त हैं या फिर ‘मौन व्रत’ धारण कर लिया है।
क्या है बेफिक्री का राज?
शहर के गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि आखिर इस ‘बेफिक्री’ का राज क्या है? दबी जुबान में लोगो का कहना है कि मैडम थाने में हों या फील्ड पर, उनका फोन अमूमन ‘सजावट’ की वस्तु ही बना रहता है। अब सवाल यह है कि जिस कुर्सी पर बैठकर जनता की सुनवाई होनी चाहिए, अगर वहां फोन ही नहीं उठेगा, तो फरियादी न्याय की गुहार लगाने कहाँ जाए? कबूतर भेजे?
हैरानी की बात यह है कि सब कुछ जानते हुए भी ‘सिस्टम’ खामोश है। न कोई नोटिस, न कोई फटकार। क्या मैडम के सिर पर किसी ‘भोपाल वाले बड़े हाथ’ का आशीर्वाद है, जो फोन न उठाने की गुस्ताखी को भी ‘मैनेज’ कर लिया जाता है?
साहब लोग भी हैं बेबस
हालात ऐसे हैं कि अब वरिष्ठ अधिकारियों ने भी शायद उम्मीद छोड़ दी है। जब भी इस थाने से संपर्क करना होता है, तो लोग मैडम को फोन लगाने की बजाय थाने के किसी मुंशी या सिपाही को फोन लगाना ज्यादा बेहतर समझते हैं। कम से कम वहां ‘हैलो’ की आवाज तो आती है!
