5 का 25 करने चले थे हुजूर, पर ‘बड़े दरबार’ से फोन आया तो धरे रह गए अरमान
शहर के पुलिस महकमे में इन दिनों एक ‘नए साहब’ और उनके ‘चाणक्य ड्राइवर’ की जुगलबंदी खूब चर्चा में है। साहब देखने में बड़े ही सज्जन है। और शायद इसी कारण शहर की ‘जियो-पॉलिटिक्स’ समझने में थोड़े कच्चे निकले।
ड्राइवर बना ‘सुपर-बॉस
महकमे के गलियारों में दबी जुबान में चर्चा है कि साहब की कुर्सी का रिमोट कंट्रोल दरअसल उनकी सरकारी जिप्सी के स्टीयरिंग पर बैठे ‘सारथी’ (Driver) के हाथ में है। सुना है कि यह ‘वफादार’ ड्राइवर साहब को दिन-रात पट्टी पढ़ाता है। और अब महकमे में चर्चा है कि ड्राइवर गाड़ी चलाता है या ड्राइवर साहब को चलाता है?
5 से 25 का सपना और ‘रेत’ की दीवार
सारथी की सलाह मानकर साहब ने फरमान सुना दिया। जहाँ से हर महीने 5 यूनिट’ की सेवा आती थी, वहां डिमांड सीधे ’25’ की रख दी गई। तर्क था— “हम नए हैं, हमारा रुतबा अलग है।”
अपना खौफ जमाने के लिए साहब ने रात के अंधेरे में गुजरने वाले ‘रेत के डंपरों’ पर टेढ़ी नजर कर ली। सोचा, एक-दो को रोकेंगे तो बाकी खुद-ब-खुद लाइन पर आ जाएंगे और चढ़ावा 25 तक पहुँच जाएगा।
जब बज गई ‘ऊपर’ की घंटी
साहब ने जोश-जोश में एक ‘बड़ी मछली’ (रेत से भरा ट्रक) को पकड़ कर खड़ा तो करवा लिया, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि उस ट्रक के टायरों में हवा भरने का काम महकमे के ही एक ‘वरिष्ठ देवता’ के आशीर्वाद से होता है।
उड़ती-उड़ती खबर है कि जैसे ही ‘बड़े साहब’ को पता चला कि उनके ‘खास आदमी’ का ट्रक नए साहब ने रोक लिया है, तो फोन की ऐसी घंटी बजी कि नए साहब का बीपी लो हो गया।
छोड़ो वरना
सूत्र बताते हैं कि उधर से ऐसी डांट पड़ी कि साहब को समझ नहीं आया कि सैल्यूट मारें या सॉरी बोलें। जिस ’25’ के सपने वो ड्राइवर की बातों में आकर देख रहे थे, वो सपना तो टूटा ही, साथ में महकमे में चर्चाएं भी हो गई ट्रक तो छोड़ना ही पड़ा, साथ में यह भी सुनना पड़ा कि— “इस शहर में रहना है, तो सिस्टम से चलो, ड्राइवर से नहीं!”
निष्कर्ष
फिलहाल साहब उस सर्किल में शांत बैठे हैं। 25 की फाइल बंद कर दी गई है और पुराने ‘5’ पर ही संतोष किया जा रहा है। पर सवाल यह है कि वो ड्राइवर अभी भी साहब की गाड़ी चला रहा है या साहब ने समझदारी दिखाते हुए स्टीयरिंग अपने हाथ में ले ली है?
